गोरखपुर : स. शि. मं. व. मा. वि. सुभाषचन्द्र बोस नगर, सूर्यकुण्ड में मनायी गयी संत रविदास जयंती

गोरखपुर : स. शि. मं. व. मा. वि. सुभाषचन्द्र बोस नगर, सूर्यकुण्ड में मनायी गयी संत रविदास जयंती

गोरखपुर। सरस्वती शिशु मन्दिर वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय, सुभाषचन्द्र बोस नगर, सूर्यकुण्ड के रज्जू भैया सभागार में संत रविदास जयन्ती मनायी गयी। इस अवसर पर पर मुख्य वक्ता आचार्य व्यास कुमार श्रीवास्तव ने कहा कि माघ मास की पूर्णिमा को जब रविदास जी ने जन्म लिया। वह रविवार का दिन था, जिसके कारण इनका नाम रविदास रखा गया। रविदास चर्मकार कुल में पैदा हुए थे इस कारण आजीविका के लिए भी इन्होंने अपने पैतृक कार्य में ही मन लगाया। ये जूते इतनी इतनी लगन और मेहनत से बनाते मानो स्वयं ईश्वर के लिए बना रहे हों। उस दौर के संतों की खास बात यही थी कि वे घर बार और सामाजिक जिम्मेदारियों से मुंह मोड़े बिना ही सहज भक्ति की ओर अग्रसर हुए और अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों का निर्वाह करते हुए ही भक्ति का मार्ग अपनाया।

आचार्य व्यास कुमार श्रीवास्तव ने कहा कि संत रविदास की अपने काम के प्रति प्रतिबद्धता इस उदाहरण से समझी जा सकती है, एक बार की बात है कि रविदास अपने काम में लीन थे कि उनसे किसी ने गंगा स्नान के लिए साथ चलने का आग्रह किया। संत जी ने कहा कि मुझे किसी को जूते बनाकर देने हैं यदि आपके साथ चला तो समय पर काम पूरा नहीं होगा और मेरा वचन झूठा पड़ जाएगा। और फिर मन सच्चा हो तो कठौती में भी गंगा होती है आप ही जाएं मुझे फुर्सत नहीं। यहीं से यह कहावत जन्मी मन चंगा तो कठौती में गंगा। संत रविदास ने अपने दोहों व पदों के माध्यम से समाज में जागरूकता लाने का प्रयास भी किया। सही मायनों में देखा जाए तो मानवतावादी मूल्यों की नींव संत रविदास ने रखी। वे समाज में फैली जातिगत ऊंच-नीच के धुर विरोधी थे और कहते थे कि सभी एक ईश्वर की संतान हैं जन्म से कोई भी जात लेकर पैदा नहीं होता। इतना ही नहीं वे एक ऐसे समाज की कल्पना भी करते हैं जहां किसी भी प्रकार का लोभ, लालच, दुख, दरिद्रता, भेदभाव नहीं हो। इस अवसर पर भारतीय वैज्ञानिक चन्द्रशेखर वेंकट रमन को याद करते हुए राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के बारे मे बताया। इस अवसर पर विद्यालय के सभी आचार्य बंधु व छात्र मौजूद रहे।