त्याग और बलिदान की प्रतिमूर्ति थी राजमाता जीजाबाई जी : प्रधानाचार्य

त्याग और बलिदान की प्रतिमूर्ति थी राजमाता जीजाबाई जी : प्रधानाचार्य
त्याग और बलिदान की प्रतिमूर्ति थी राजमाता जीजाबाई जी : प्रधानाचार्य
प्रतापगढ़। सरस्वती विद्या मन्दिर सगरा सुंदरपुर प्रतापगढ़ में छत्रपति शिवाजी महाराज की जननी, साहस, त्याग और बलिदान की प्रतिमूर्ति राजमाता जीजाबाई जी की पुण्यतिथि मनाई गई।
  • इस दौरान प्रधानाचार्य जी ने उनके बारे बताते हुए कहा कि मराठा सम्राट छत्रपति शिवाजी राजे भोसले की माता जीजाबाई का जन्म सिंदखेड़ नामक गाँव में हुआ था। यह स्थान वर्तमान में महाराष्ट्र के विदर्भ प्रांत में बुलढाणा जिले के मेहकर जनपद के अन्तर्गत आता है।
  • उनके पिता का नाम लखुजी जाधव तथा माता का नाम महालसाबाई था। वीर माता जीजाबाई छत्रपति शिवाजी की माता होने के साथ-साथ उनकी मित्र, मार्गदर्शक और प्रेरणास्त्रोत भी थीं। उनका सारा जीवन साहस और त्याग से भरा हुआ था।
  • उन्होने जीवन भर कठिनाइयों और विपरीत परिस्थितियों को झेलते हुए भी धैर्य नहीं खोया और अपने ‘पुत्र ‘शिवा’ को वे संस्कार दिए, जिनके कारण वह आगे चलकर हिंदू समाज का संरक्षक ‘छात्रपति शिवाजी महाराज’ बना।
  • जीजाबाई यादव उच्चकुल में उत्पन्न असाधारण प्रतिभाशाली थी। जीजाबाई यादव वंश की थी और उनके पिता एक शक्तिशाली सामन्त थे।
  • शिवाजी महाराज के चरित्र पर माता-पिता का बहुत प्रभाव पड़ा। बचपन से ही वे उस युग के वातावरण और घटनाओँ को भली प्रकार समझने लगे थे।
  • शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक के 12 दिन बाद 17 जून 1674 के दिन रायगढ़ के पचड़ गांव में जीजामाता ने अंतिम सांस ली।
  • ऐसा लग रहा था कि मानों मौत भी छत्रपति शिवाजी के राज्याभिषेक की प्रतीक्षा कर रहा हो।
  • उनकी मृत्यु शिवाजी के लिए तो अपूरणीय क्षति ही थी। मराठों को भी इसका गहरा आघात लगा था। क्योंकि जीजामाता जनता का बहुत ध्यान रखती थीं।