लखीमपुर : प्रखर युवा नेत्री ज्योतिर्मयी गांगुली का मनाया गया बलिदान-दिवस

लखीमपुर : प्रखर युवा नेत्री ज्योतिर्मयी गांगुली का मनाया गया बलिदान-दिवस

लखीमपुर। सनातन धर्म सरस्वती शिशु मंदिर मिश्राना में प्रखर युवा नेत्री ज्योतिर्मयी गांगुली का बलिदान-दिवस मनाया गया। विद्यालय के वरिष्ठ आचार्य जी ने भैया बहनों को संबोधित करते हुए बताया कि भारत की स्वाधीनता के यज्ञ में अपनी प्राणाहुति देने वाली कुमारी ज्योतिर्मयी गांगुली का जन्म 1889 में कोलकाता के एक धनी व्यक्ति श्री द्वारकानाथ जी के घर में हुआ था। उनके आग्नेय भाषण श्रोताओं के हृदय को आंदोलित कर देते थे। इस कारण शासन भी उनसे थर्राता था। स्वाधीनता संग्राम के दौरान जब भी कोई आंदोलन या अभियान होता, वे सबसे आगे बढ़कर उसमें भाग लेती थीं। 1921 का असहयोग आंदोलन, नमक सत्याग्रह, 1930 का सविनय अवज्ञा आंदोलन, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार तथा 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में वे कई बार जेल गयीं। 

ज्योतिर्मयी अपने भाषण में पुलिस वालों का स्वाभिमान जगाने का प्रयास भी करती थीं; पर पुलिस वाले सिर झुका कर रह जाते थे। उनके जीवन की एकमात्र प्राथमिकता देश की स्वाधीनता थी। उसकी प्राप्ति तक उन्होंने अविवाहित रहने का निर्णय लिया तथा अपनी सरकारी नौकरी भी छोड़ दी। ज्योतिर्मयी गांगुली के पास एक विशेष प्रकार की कार थी। उसके रूप, रंग और हार्न को पुलिस वाले खूब पहचानते थे। जैसे ही उन्हें कहीं आंदोलन या सत्याग्रहियों पर होने वाले अत्याचार की सूचना मिलती, वे अपनी कार में बैठकर वहां पहुंच जाती थीं। इससे आंदोलनकारियों का उत्साह बढ़ जाता था, जबकि पुलिस वाले हतोत्साहित होकर पीछे हट जाते थे।