लखीमपुर: पं0 दीनदयाल उपाध्याय सरस्वती विद्या मंदिर इंटर कॉलेज में मनाया गया शहीदी दिवस

लखीमपुर: पं0 दीनदयाल उपाध्याय सरस्वती विद्या मंदिर इंटर कॉलेज में मनाया गया शहीदी दिवस
लखीमपुर: पं0 दीनदयाल उपाध्याय सरस्वती विद्या मंदिर इंटर कॉलेज में मनाया गया शहीदी दिवस
लखीमपुर: पं0 दीनदयाल उपाध्याय सरस्वती विद्या मंदिर इंटर कॉलेज में मनाया गया शहीदी दिवस

लखीमपुर। विद्या भारती विद्यालय पं0 दीनदयाल उपाध्याय सरस्वती विद्या मन्दिर इण्टर कालेज (यू.पी.बोर्ड), खीरी में आज वन्दना सभा में गुरु तेग बहादुर सिंह का शहीदी दिवस मनाया गया । विद्यालय के प्रधानाचार्य डॉ० योगेन्द्र प्रताप सिंह जी ने भैयाओं को इस दिवस के बारे में विस्तार से बताया कि गुरु तेग़ बहादुर सिखों के नौवें गुरु थे, इनका जन्म अप्रैल, 1621 में अमृतसर में हुआ था। उनके पिता का नाम गुरु हर गोविन्द तथा माता का नाम नानकी था। उनका बचपन का नाम त्यागमल था। सिखों के आठवें गुरु (हरकिशन सिंह) तथा उनके पिता ने उनकी योग्यताओं एवं बहादुरी को देखते हुए उन्हें ‘गुरु तेग़बहादुर’नाम दिया था। 20 मार्च, 1664 को गुरु तेग़ बहादुर ने सिखों के गुरु का पदभार संभाला। 

औरंगजेब के आदेशानुसार उसी समय कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार कर वहाँ का गवर्नर (इफ्तार खां) उन्हें मुसलमान बनने को बाध्य कर रहा था। ‘गुरु तेग़बहादुर’ ने जब मुगल बादशाह औरंगज़ेब द्वारा जबरन धर्म परिवर्तन का विरोध किया तो औरंगज़ेब के सिपाहियों ने उन्हें बंदी बना लिया। ‘गुरु तेग़ बहादुर’ को बंदी बनाकर आठ दिनों तक चांदनी चौक की कोतवाली में रख कर प्रताड़ित किया गया फिर भी वो अपने फैसले पर अडिग रहें। चांदनी चौक में सरेआम मुगल बादशाह औरंगज़ेब के जल्लादों ने 24 नवंबर सन् 1675 को उनका सिर उनके धड़ से अलग कर दिया। 14 वर्ष की अल्पायु में मुगलों के दांत खट्टे कर देने वाले महान धुरंधर एवं अद्वितीय प्रतिभा के धनी गुरु तेग़ बहादुर साहब का नाम धर्म एवं मानवीय मूल्यों के खातिर अपने प्राणों की आहुति देने वाले विभूतियों कि अग्रिम श्रेणी में आता है। जिन्होंने धर्म की महत्ता को स्थापित करने के लिए औरंगजेब द्वारा क्रूरता से प्रताड़ित होने के बाद भी इस्लाम कबुल नहीं किया। उन्होंने अपना सिर कटा दिया पर अपना केश (बाल) नहीं कटने दिया।