प्रयागराज : रानी रेवती देवी सरस्वती विद्या निकेतन ने अमर सेनानी अमरचंद सेठ जी के बलिदान दिवस पर विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की

प्रयागराज : रानी रेवती देवी सरस्वती विद्या निकेतन ने अमर सेनानी अमरचंद सेठ जी के बलिदान दिवस पर विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की

प्रयागराज। विद्या भारती से संबद्ध काशी प्रांत के रानी रेवती देवी सरस्वती विद्या निकेतन इंटर कॉलेज, राजापुर, प्रयागराज के संगीताचार्य एवं मीडिया प्रभारी मनोज गुप्ता की सूचनानुसार विद्यालय के प्रधानाचार्य श्री बांके बिहारी पांडे जी ने अमर सेनानी सेठ अमरचंद  जी के बलिदान दिवस  पर विद्यालय परिवार सहित विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की l


     उन्होंने बताया कि स्वाधीनता समर के अमर सेनानी सेठ अमरचन्द मूलतः बीकानेर (राजस्थान) के निवासी थे। वे अपने पिता श्री अबीर चन्द बाँठिया के साथ व्यापार के लिए ग्वालियर आकर बस गये थे। जैन मत के अनुयायी अमरचन्द जी ने अपने व्यापार में परिश्रम, ईमानदारी एवं सज्जनता के कारण इतनी प्रतिष्ठा पायी कि ग्वालियर राजघराने ने उन्हें नगर सेठ की उपाधि देकर राजघराने के सदस्यों की भाँति पैर में सोने के कड़े पहनने का अधिकार दिया। आगे चलकर उन्हें ग्वालियर के राजकोष का प्रभारी नियुक्त किया।अमरचन्द जी बड़े धर्मप्रेमी व्यक्ति थे।

1855 में उन्होंने चातुर्मास के दौरान ग्वालियर पधारे सन्त बुद्धि विजय जी के प्रवचन सुने। इससे पूर्व वे 1854 में अजमेर में भी उनके प्रवचन सुन चुके थे। उनसे प्रभावित होकर वे विदेशी और विधर्मी राज्य के विरुद्ध हो गये। 1857 में जब अंग्रेजों के विरुद्ध भारतीय सेना और क्रान्तिकारी ग्वालियर में सक्रिय हुए, तो सेठ जी ने राजकोष के समस्त धन के साथ अपनी पैतृक सम्पत्ति भी उन्हें सौंप दी।उनका मत था कि राजकोष जनता से ही एकत्र किया गया है। इसे जनहित में स्वाधीनता सेनानियों को देना अपराध नहीं है और निजी सम्पत्ति वे चाहे जिसे दें; पर अंग्रेजों ने राजद्रोही घोषित कर उनके विरुद्ध वारण्ट जारी कर दिया। ग्वालियर राजघराना भी उस समय अंग्रेजों के साथ था।


अमरचन्द जी भूमिगत होकर क्रान्तिकारियों का सहयोग करते रहे; पर एक दिन वे शासन के हत्थे चढ़ गये और मुकदमा चलाकर उन्हें जेल में ठूँस दिया गया। सुख-सुविधाओं में पले सेठ जी को वहाँ भीषण यातनाएँ दी गयीं। मुर्गा बनाना, पेड़ से उल्टा लटका कर चाबुकों से मारना, हाथ पैर बाँधकर चारों ओर से खींचना, लोहे के जूतों से मारना, अण्डकोषों पर वजन बाँधकर दौड़ाना, मूत्र पिलाना आदि अमानवीय अत्याचार उन पर किये गये। अंग्रेज चाहते थे कि वे क्षमा माँग लें; पर सेठ जी तैयार नहीं हुए। इस पर अंग्रेजों ने उनके आठ वर्षीय निरपराध पुत्र को भी पकड़ लिया।


 विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करने वालों में रमेश चंद्र मिश्रा, जटाशंकर तिवारी, शिव नारायण सिंह, कामाख्या प्रसाद दुबे, आनंद कुमार, दिनेश कुमार शुक्ला, सत्य प्रकाश पांडे प्रथम, अवधेश कुमार, वकील प्रसाद, वाचस्पति चौबे, सुनील कुमार, शशी कपूर गुप्ता, प्रेम सागर मिश्रा, प्रभात कुमार शर्मा, मनोज  कुमार गुप्ता, दीपक दयाल, रमेश चंद्र अग्रहरि, सत्य प्रकाश पांडे द्वितीय, कपिल देव सिंह, वंशराज यादव, विमल चंद दुबे एवं विभु श्रीवास्तव सहित पूरा विद्यालय परिवार शामिल रहा।